काठकोपनिषद्

काठकोपनिषद्
काठकोपनिषद् /kāṭhakopaniṣad/ (/kāṭhaka + upaniṣad/) f. см. कठीपनिषद्




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उपाविश्, दुर्भग, °मूर्ध, अन्तर्वंशिक, शैख, युवन्त्, निबन्धिन्, दुरुपदेश, अविशिष्ट, प्रावृष्, नीकाश, नृसिंह, प्रभविष्णुता, नौदण्ड, राजपथ, जवनिका, प्राशु, सेतुबन्ध, अभिसंधा, महार्णव, दारुणता, वारमुख्य, गृहार्थ, वर्तुल, उष्णीष, पाल, कृतलक्षण, सातिरेक, सर्वाङ्गीण, विशिशसिषु, अक्षत, वारयुवति, आतङ्क, महिलारोप्य, अदामन्, श्वोवस्यस, नववार्षिक, पथोस्, स्त्रीजित, आर्ति, बुरुड, रोम°, दशदिश्, छत्त्रधारत्व, भ्रज्ज्, रुक्मवक्षस्, निष्क्लेश, यावदन्ताय, मधूच्छिष्ट, औक्ष्ण, अपवह्, अकरण, अनवपृग्ण, कृपावन्त्, जातेष्टि, प्रतिलङ्घ्, संदिह्, वृषमन्यु, हूति, बाहव, उलूक, माणव, नेद्, नेक्षण, प्रताप, त्विष्, सुमित्र, प्रोच्चण्ड, गोपय्, विपद्, अपार, लोकवृत्त, समुद्रार्त्ह, वेष, दुरेव, हर्, प्रजानाथ, काम, रुक्म, प्रतिवस्तु, द्विमुख, पार्श्वचर, पड्बीश, क्षीरनिधि, प्लाशि, क्षौर, शरीरस्थ, प्रत्याहर्, उत्थ, पृतनायत्, वनिष्ठ, कल्पना, लघीयंस्, प्रव्राजन, अहंकृति, उल्लेख, समुदाय, शतार्ध, अनुरम्, ग्राहक, उत्तरपद, पुरुधा, निग्राभ, ते, मयूखिन्, आसुर, संताप, ब्रह्मदेय, आविद्, जगदण्ड, कुण्डी, जनिता, आप्लव, असमाप्त, वेद, संघट्ट, प्रतिघातिन्, बहुपत्नीक, परिष्टुति, अवस्फूर्ज्, अवतार, समागम, एकातपत्र, मृगीदृश्, स्युड्, उपशान्ति, संपूरय्, प्रस्यन्द, भृत्यभाव, ध्रु, रन्, त्रा, वावात, अविक्षुब्ध, अभिलप्, ख्याय, खण्डशस्, तपोवन, द्विजादि, द्वैप, आवसति, पुष्पामोद, शीर्षतस्, गहन, कृषि, वयोधेय, त्रिःस्नान, नद, विकर्त्तर्, विशङ्क, विलेपिन्, अगोचर, अतिया, जीमूत, प्राच्य, त्रिपुरद्विष्, अपूर्वत्व, सुधन, वात्स्यायन, सम्यग्°, ज्वलन, सख, प्रचक्ष्, प्रतीशीन, यथोपपन्न, व्यक्तीकरण, सचेतस्, हल्लीश, अमुया, वाचिन्, श्वेत्य, साधुता, °प्रशंसिन्, निरुपम, प्रमृष्ट, शूर्प्, सुषुप्सा, संभा, प्रत्नथा, पूरुष, कर्षय्, तोकिनी, पृथुलौजस्, उत्कलिक, प्रतापवन्त्, नाकसद्, वक्रभाव, पवित्रारोपण, खञ्ज्, कार्यातिपात, शरवण, आनी, योजक, ह्रस्वकर्ण, प्रतिपाण, भवितव्यता, वैशारद, हेमन्, अभग, प्रमर्दन, वैषम्य, गोरक्ष्य, अन्तर्भाव, सुक्षेत्र, तैलपात्र, रहण, सजाल




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