स्पश्

स्पश्
स्पश् III /spaś/ (P. pr. /spāśayati/ — X; aor. /apispaśat/)
1) брать
2) обнимать




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तादृश, क्षमाशील, धाराङ्ग, हविस्, पुच्छाग्र, तर्द्, °संहर्षिन्, शाङ्खायन, सत्, दांपत्य, °छिद्, नीलवर्ण, श्वसन, तृदिल, षण्मासी, अपूर्व, हेमक, बभ्रु, अस्वकरण, न्यञ्च्, मे, बस्त, हुडु, न्यूनी कर्, तुषारगिरि, दिक्पथ, अभिमुखीभू, एने, मृत, चल्, भिक्षुचर्या, अनुवर्ध्, देवपूजा, दयिता, तमस्विनी, शत्रुता, महामनस्, °निर्वापक, भिदा, संज्वलन, अभ्यस्त, वयस्य, विस्फोट, कामिन्, छाग, यथायोग्यम्, अदुःक, तस्याम्, किलासी, परिभ्रमण, सनियम, ज्ञातिभाव, सवासस्, ब्रह्मभवन, नौकादण्ड, सौहृद, निर्ऋति, पूर्वभुक्ति, अतिष्कन्द्, क्षेत्रिक, विवस्, संबुध्, विघ्नवन्त्, परिचय, भेदक, निग्राह्य, तीर्ण, सुवित्त, नैषध, सौष्ठव, उरा, निशाम, रङ्गावतारक, स्वगा, अभ्युदि, प्रमद, सुषुम्ण, त्रिषवण, अभिदृश्य, नीरधि, गर्भधि, वनलता, दुःख-कर, द्वैमास्य, अवयज्, नामवन्त्, अभिद्रुह्, दारग्रहण, क्षि, त्रैमासिक, असामान्य, सहिष्ट, दशक, पापमति, सद्गुण, लेख्य, ब्रह्मचर्य, विप्रकार, काली, लम्भ, प्रतिहतधी, ध्वजवन्त्, अभिजन, लोहमय, शृङ्ग, प्रपापालिका, प्रजय, भुरण, सूक्ष्मत्व, निध्या, परु, तीर्थशिला, अनुप्रेषय्, उल्लसित, महाहस्त, शान्तिभाजन, दौःस्थ्य, विप्रमुक्त, प्रियदर्श, विमुक्त, हस्तिस्नान, संप्रनश्, उर्वी, अपव्यध्, निरन्वय, दृष्ट्वा, चतुःशाल, पत्नीय, सगौरवम्, निष्पर्यन्त, हरिद्रा, प्रवा, अस्थान, दशशतकरधारिन्, वादयुद्ध, मेनका, उपपति, अर्तिष्ठुर, सजाल, लुण्ठक, ऋष्, विद्या, नाक, रसान्तर, अर्घ, रञ्जक, विचिन्त्, मास्, दिवानिशम्, सुदानु, विमन्, हास्तिनपुर, संदेह, आक्षेपरूपक, समालोक्, निशरण, देवर्षि, सार्थिक, वर्धक, द्यूतधर्म, प्राप्ति, सभापति, दैन्य, सरणि, आसू, शब्दिन्, ग्रन्थन, तन्द्र, उष्णालु, कुविन्द, दारी, शच्, तारारमण, उक्ति, परिश्रम्, विपन्या, विधिवत्, मल, उपकारिका, वर्त्र, दुस्थित, वित्रासन, विमोक्षण, प्रतियोगिन्, समालाप, वासार्थम्, घटीयन्त्र, अचेतस्, रजोमेघ, अञ्जनचूर्ण, औशीनरी, दरीवन्त्, प्रतिबन्ध्, मङ्गलीय, मद्गु, पितृत्व, रथनेमि, प्रार्थित, सुरी, ब्रह्मविद्या, अशिव, कर्णाभरण, पिच्छा, किष्कु, कक्कोल, स्पन्दित, पावन




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