ज्ञीप्सा

ज्ञीप्सा
ज्ञीप्सा /jñīpsā/ f.
1) осведомление
2) вопрос




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हृदिस्पृश्, कार्योपेक्षा, हविर्मथि, सुमित, नभस, निर्जन, नभोवीत्ही, संख्या, निशम्, निरुपम, अभिगा, धावय्, स्वयमाहृत, स्पूर्ध्, दर्श, पामर, पृथुश्रोणी, निप, द्रप्सिन्, मञ्जुभाषिन्, अभिरक्ष्, मय, आभा, भूषाय, पिपासन्त्, वेत्रवती, ध्यात्व, नीवी, शुभदिन, कौमुदी, सर्वसमता, रस्, स्तब्धी, तुरीय, आसर्, धिक्, परिमर्द्, हितोपदेश, अनामय, अतिरमणीय, संददि, शकटिका, उपाध्याय, परिरम्भ, कूदी, नचिर, पुंनपुंसक, प्रभाकर, उत्सर्ज्, त्रिरात्र, दर्पज, तादृक्ष, द्विक, बास्तिक, समश्नुव, सूचना, यमक, उदावह्, समुद्रवासिन्, विकरण, शिवा, गौतम, विनयन, ऋक्ष, द्वैतिन्, विशेषविद्, विस्यन्द्, विनिर्गम्, वृद्धवयस्, निविद्, शुल्क्, यावद्धा, अद्वैत, सदोष, मांसखण्ड, दुर्गह, दीर्घता, अग्निपुराण, रदनच्छद, इन्द्राणी, व्यादेश, कूर्मपति, कण्व, निशीथिनीनाथ, परिदेविन्, उद्गीति, वल्लभ, शास्, सीसक, उदर्क, अपवर्ज्, नष्टचेष्ट, दुर्विलसित, दक्षिणामुख, नराधिप, सहज, नियुद्ध, लघ्वी, वर्णक, हित, प्रमुक्ति, अन्तर्भाव, वृषभध्वज, मुष्, बलसमूह, निष्ठूरिन्, दृष्ट्वा, जेमन्, विकसित, स्तुका, रोहित, असमुद्यम, सुवेद, ध्मा, महापथ, स्वज, उषासानक्त, असंवीत, मध्येसमुद्रम्, गञ्ज, जीवितेशा, सोमन्, समाहितमति, शेषतस्, तरसमय, स्मार्त, अमरु, नवक, पुंभाव, जन्तु, निद्, उद्गमनीय, निद्रा, विशीर्य, एकादश, आलोकन, शर्मण्य, °प्रदर्शिन्, नौकर्मन्, संनह्, श्रम्भ्, वायव, कोसत, साकंवृध्, औचित्य, उत्सेध, दुर्गपाल, क्षुध्, नदीन, अकाण्ड, पठन, शु, परिफुल्ल, दा, तादृग्विध, वसुर, नाथ्, संपूजन, ब्रह्मचर्य, नगावास, प्रस्मर्तव्य, प्रह्व, भद्रमुख, वीतव्रीड, समदर्शन, ईहा, भर्तृप्रिय, देवाधिप, उत्कर्त्, अतिरंहस्, अभिविमर्ज्, विवदिषु, शिल्प, दीधिति, ब्रह्मकार, पुलस्ति, होमकाल, परागम्, अपान्, सचेतन, षाडव, अभिविनी, घण्टिका, उच्चत्व, कामरूपिन्, हरिहेति, प्रमनस्, द्रविणोदा, प्लोष, रिक्थभाज्, चेट, अर्यमन्, इत्था, शुशुक्वन, कुम्भक, सुविस्तर, दानुमन्त्, अपवृत्त, सार्थपति, प्रमादिन्, मेषिका, तर्, मैरेय, अमार्जित, विनिश्वास, दासजीवन, पूर्णपात्र
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