ज्ञीप्सा

ज्ञीप्सा
ज्ञीप्सा /jñīpsā/ f.
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2) вопрос




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दैह्य, जना, ग्राम्य, प्रली, भूति, दुर्लभस्वामिन्, हितकाम, दासवर्ग, शतक्रतु, प्रमृग्य, रण्, अवस्थित, सप्ताङ्ग, संध्यासमय, निर्वैरिण, ध्वस्मन्वन्त्, दानशील, वासवाशा, ज्योतिःशास्त्र, पट्टन, अभिविख्य, दशेरक, नभ्य, वालुकामय, आभग, विदल्, मा, विश्वशंभू, उत्कर्, शोणित, विचेष्टन, मङ्गलादेशवृत्त, उच्छ्रयण, द्वार्बाहु, मल्लिका, प्रचित, ऋतावन्, परिशेष, मांसविक्रय, एकज, मत्स्याद, वेगवन्त्, प्रतिगम्, संप्रदिश्, प्रतिवात, सनाथ, निर्मन्थ, संलक्ष्, सत्त्वोत्कर्ष, मथिन्, अभिघर्, दृषदुपल, पापहृदय, वीति, स्नपन, वञ्च्, मध्यमपुरुष, सिताम्बर, कर्करि, रेचन, द्यावा, गोयान, वनगज, चाल, अश्वा, मदीय, उपसिच्, कलधौत, सुकृत, तिमि, अग्निपुराण, अतिप्राकृत, अतिशिथिल, महापातक, शारद, पुष्पिन्, द्वीप्य, छेलक, स्रव, कनकरस, प्रसूत, कलियुग, लोमगर्त, सह्य, अभिक्षम्, स्पर्धिन्, त्रिलोकनाथ, लिट्, नाभागारिष्ट, तड्, शुप्ति, गालि, अलाबु, क्रमशस्, गोलक, राजभवन, समाभाष्, त्रिपुट, निस्तरण, हिरण्यपाणि, माणिक्य, उदज, संभार्य्, कृशत्व, विविक्ति, अभ्यवहर्, अल्पक, वृद्धसृगाल, शिलापट्ट, देवतुमुल, उन्मथ्य, जलदसमय, प्रयुज्, नटन, संलप्, कठोरचित्त, गिर्, भ्रंश, परिकम्पिन्, प्रत्यङ्मुख, पीत, शश्वधा, बलहीन, विनदिन्, त्रिषत्य, पर्यास, संतर्, क्रन्दन, मणिकर्णिका, प्रत्यासद्, बदर, परिपाठ, मद्विध, श्रमयु, पि, शाखाङ्ग, शाखा, कृत, अभिसंहित, स्थानान्तर, भल्ल, वैर, अचला, लोच्, रजत, निर्मनुष्य, प्रचक्ष्, गन्धर्व, विसंज्ञ, दौरित, नेत्र्य, अन्धी, विकस्ति, जीवसुत, विघ्नवन्त्, राजप्रेष्य, पृष्ठभाग, शाश, निसर्गतस्, प्रवेश्य, वृक्षवाटिका, द्युनिश्, पायक, देहकृत्, पावन, संशुद्धि, अभिधेय, कौष्ठ, स्तम्ब, संप्रतिज्ञा, राजवत्, वृक्षमूल, सुप्राप, अविचार, दास, द्रविड, धनस्पृत्, मरीचिन्, प्राणथ, रंहि, चित्तिन्, मृगराज्, सुधर्मन्, जीवनी, उच्चैर्धामन्, निमज्ज्, प्लिहन्, भुक्तपीत, निवर, हितकृत्, शसा, अनुभू, विलोकन, संगोपन, सहकर्तर्, अच्युत, उक्थ, अकृतसत्कार, स्वसृ, अभ्यनुवच्, तोयद, पक्वेष्टक, धूममहिषी, ईशन, षडर्च, उद्भव, निरीहा




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