क्षितिभृत्

क्षितिभृत्
क्षितिभृत् /kṣiti-bhṛt/ m.
1) гора
2) царь, правитель




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धार्य, सरक, विपिन, प्रतिप्रिय, प्रियवचन, दाहज्वर, बृहन्नल, यज्ञवाहन, समाविद्, भव, चरितार्थ, जयकृत्, चकित, सनिश्वासम्, समादेश, सप्तवर्ष, कीर्ण, निवह्, सत्यधृति, दम्भोलिपातय, प्रमति, अनसूया, एतावन्त्, हारिद्रत्व, प्राप्तजीवन, भू, अतिभू, शम्बिन्, प्राग्गमनवन्त्, सर्वमनोरम, अभिधम्, मानससंताप, त्रिपक्ष, प्रत्यूह, नाथवन्त्, यातर्, सप्तशत, सधस्त्ह, परिणम्, विख्यापन, भागीयंस्, वासवेश्मन्, अविशिष्टत्व, °विद्योतिन्, साय, सपरितोषम्, वसति, संमूता, मृज्, विकूज्, शुचिष्मन्त्, सुमेरु, यजुस्, सीमावृक्ष, कल्माष, आदि, तावज्ज्योक्, निष्षिध्, प्रणपात्, प्रार्थक, शतसहस्र, जिह्व, नागरिक, अधिवासन, मयोभुव, विनिष्क्रम्, क्षौरकरण, राक्षसत्व, इष्ट, बालि, पिष्टपचन, निऋघण्ट, सुमन्तु, जलविहंगम, अनिशित, धिन्व्, नदनु, चतुस्, व्रज्, अतिथिन्, त्रिदिवौकस्, प्रादोष, प्राणिवध, अष्टसप्तति, लवणोद, रत्नसू, व्यत्यास, धनवर्जित, चम्पक, स्यद, ऐष्टक, विद्वेषण, लुल्, युज्, फाल्गुन, विफल्, दैह्य, प्रसद्, घृणा, आस्वाद, कोलाहल, देवयात्रा, अन्यार्थ, बालिशता, उत्तरा, हारहूण, निकुरुम्ब, शाकवाटिका, कृतज्ञ, श्वन्, शासितर्, सीरिन्, कलिका, शिलामय, पाशक, सिद्धयोगिनी, पीलु, कुलज, विष्कम्भक, समराङ्गन, स्थूलता, प्रसिध्, निग्रह, ईहा, बहुपुष्ट, दक्षिण्य, श्वपति, प्रतियोग, पारलोक, स्वर, श्रोत्रपरंपरा, पुण्यता, वेसर, पड्बीश, वैजयन्त, सह, अत्याहित, वक्रभाव, गौरी, गोत्ररिक्थ, अनुमद्, सर्पविवर, घूर्ण, निर्विष, अभिहन्, °रोपिन्, प्रत्यभिधा, रोहिणी, संनथ, केन्द्र, संदेहपद, स्वज, नेतर्, नैष्किंचन्य, असत्, महाजव, अधुना, निःक्षत्र, कन्दर्प, धौरेय, पृश्नि, मुक्षीजा, ल्+, परिस्कन्न, प्राणप्रिय, परिहार्य, समूहन, अभ्युत्था, सस्यरक्षक, गर्हणा, फेरव, समुद्रतस्, अनुसर्ज्, खाद, जातुषी, मूढत्व, शंसा, राजतनय, साभिलाष, प्रतिसंदिश्, दुर्लभस्वामिन्, ब्राह्मणवध, प्रतिकर्तर्, पठन, कन्दु, भूस्थ, अपवाद, परिमुच्, सुशान्त, करीर, भूरिदावरी, संगम्, संप्रधारण, तन्द्रा, दुर्मर्ष, आलप्, ऋतुसंहार, परिभर्, आविद्, रथ्या, नस्या, प्रकर्मन्, त्रपिष्ठ, अवध्यत्व, संरक्षक, पृथ्वीगृह, वाजिनीवन्त्
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