भृत्यभाव

भृत्यभाव
भृत्यभाव /bhṛtya-bhāva/ m. см. भृत्यता




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अनुसिव्, औदुम्बरी, स्खद्, आमय, दृष्टिपथ, सिंह, नैगम, परिधारणा, रणभू, क्षुध्, मर्यादाभेदक, पद्मवन्त्, पूतना, चलाचल, कर्ष्, वेतण्ड, वपुस्, पूर्वचित्ति, आसन्नवर्तिन्, ज्य्ष्ठबन्धु, ईर, सौभगत्व, सरक, वृद्धसृगाल, दक्षिणाभिमुख, वर्णता, वैकल्पिक, नानारस, साण्ड, मध्याह्न, प्रातराहुति, पूर्वसागर, संस्वप्, लोचन, आहित, शरच्चन्द्र, व्युष्टि, निष्ठिन, नैशित्य, उष्णग, सौहार्द, शचि, सांयुग-कु, सचिन्त, दुरुपदेश, महामात्र, दृप्, द्वादश, कौन्तेय, अनुविली, मिमिक्ष, सूप, निर्वप्, क्रमण, विघ्नकर्तर्, निगुह्, विभर्, सचिह्न, वक्षो°, नमोवृध्, एकशेष, महान्त, वाङ्मनस्, रुक्मिन्, कुलसंतति, सरण्यू, नदीसंतार, कराङ्गुलि, उपपुराण, पृथुक, उत्तमजन, कन्य, शिबिका, भङ्गुरावन्त्, समुच्छित्ति, निर्वासन, कठिनता, मङ्गल्य, जिज्ञासन, रंह्, भीमपराक्रम, कूर्दन, महानिश्, शुश्रूषिन्, तथा, निर्धन्त्व, घोल, अतित, क्षणदाकर, भ्राष्ट्रक, मानुषी, ताड, आसिद्ध, दृ, सिद्धाञ्जन, सहधर्मचारिन्, श्वासिन्, कूर्पासक, दशम, अतिभीषण, ताद्रूप्य, मन्दधी, शीतस्पर्श, प्रतिपद°, दृढ, उड्डमर, चकित, अनड्वाही, केशपाश, मज्मन, लब्धि, सुतप्त, जिह्मशी, शन्ताति, अप्रतिपादन, निखिल, एषिन्, षड्विंशत्, आवद्, आनह्, केदार, होड्, अनुचित, दवथु, शैक्यायस, वशंवद, परिवस्, अरुन्धती, शिशय, परीणस, शासनधर, तिज्, विरोधक, संकल्प, परितक्म्य, उच्चैस्तर, दाहिका, प्रवर, धौरेय, निधिगोप, नश्वरत्व, स्मय, अनिक्षिप्त, पण्, विलग्, प्रतिहर्य्, गिर्, मृषा, वृषदन्त, प्लोष, ताण्डवित, अदुष्टत्व, कर्णपूर, एना, यौषिण्य, प्ररुद्, निद्, रुक्मन्त्, मूर्धन्, विवेकज्ञ, प्रपलायन, निर्दय, विपन्यु, महातेजस्, विघस, अभिभू, सौदामनी, सत्त्रिन्, शामूल, बृहद्देवला, सूनृत, महागिरि, विष, दधिद्रप्स, वृक्षवाटिका, प्रतिरोधन, आकौशल, संमद्, परिरम्भण, ह्रादुनि, सामवायिक, दर्प्, छर्द्, किलिञ्ज, संक्रम, संश्रय, नान्दीमुख, समद्, अतिसरस, अनुविधायिन्, सर्वेश, भक्तिभाज्, पुरुषत्व, रात्रिंदिव, जाङ्घिक, संचोदय्, नवविंशति, व्युत्था, दुर्गह, रस्, समुद्धत, अत्या, वासन्त, भानवीय, ईर्मा, तेषु, माणव
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