हय्

हय्
हय् /hay/ (P. pr. /hayati/ — I; pf. /jahaya/; aor. /ahayīt/; pp. /hayita/)
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सबर्दुघ, मन्त्र, प्राधीत, हरित, °ष्ठीव, इरावत्, वर्धितर्, अन्तःपुर, विजामि, नना, संभूय, आस्वद्, प्रसभ°, वह्य, बाल, वारिराशि, दम्भार्थम्, उपसर्पण, °वेधिन्, उपहर्तर्, हासिन्, निदाघकर, एकरात्र, द्वंद्वभाव, मन्त्रविद्, अपी, सप्तति, वाणिज, चायु, भाक्त, सिंहध्वनि, पट्, वधकाम्या, चतुर्थकालिक, अनुदेश, रात, विलासिन्, उद्घात, सरोरुह, निर्व्यथ, राजाधिष्ठान, घनात्यय, जिति, अनिभृत, विशोषण, पूर्वी, सुगु, पदन्यास, हृद्ग, दघ्न, वेणीसंहार, चक्षुष्य, नदीनद, अग्निदग्ध, रसप्रबन्ध, विलुप्, वाम, शान्तिभाजन, तरंगिन्, टङ्कच्छेद, समवेक्षण, दक्षिणा, प्रेष्ठ, अभ्यनुज्ञान, भावयितर्, मृचय, विश्वहा, उपस्पर्शिन्, निवसन, अचेतस्, अतिपठ्, मेथि, नौ, सालस, पर्यवसान, षाड्गुण्य, भा, कल्प्, न्यर्थ, छन्द, वेदार्थ, अप्रतिम, मठर, विषवैद्य, श्रु, निर्बल, ऋष्व, सुनासिक, तृतीय, वर्तक, जलौक, विघटन, त्रिपुराराति, रक्ष्ण, समुद्रग, सर्वायुस्, निष्क्लेशलेश, शीत-रुच्, वनिन्, अविष्यु, यजिन्, व्यतिरेक, मूर्तिमन्त्, चिकित्, बाधिर्य, संलाप, कक्ष, दोहल, एकधर्म, प्रातरह्ण, सिंहचर्मन्, भास्, उष्णता, विलभ्, कौङ्कुमी, शतधा, पुरुषादक, शून्य, सर्वौषधि, प्रश्रय, प्रमथ्, नियान, सद्वृत्ति, प्रतिकङ्चुक, शाब्द, अभिनिविष्ट, व्रज, मध्यस्थ, नृत्त, वचस्यु, अतिप्राकृत, अवात, वाग्मिन्, अभ्यवहर्, सूचन, घृतनिर्णिज, शुभ, बलप्रद, स्वत्व, असुतृप्, अतिसर्ग, बलक्ष, हाल, मांसमय, ओष्ठ, ब्राह्मणत्व, श्वठ्, वर्तमान, हिमरश्मि, सुषह, एतत्काल, घटीयन्त्र, मनुजाधिप, ऊर्णामय, दुर्जनाय, देश, संदंश्, सर्वतोमुख, अवभिद्, वाजवन्त्, उद्यानमाला, चित्, मौक्तिकावली, निष्कासन, महिष, धारयित्री, विश्वासाह, प्ररुज्, करिणी, कृतमार्ग, तिर्यग्योनि, दब्ध, विनिर्जि, कुम्भकार, लघुत्व, गव, कति, जलत्रास, देवगुरु, श्वान्त, सप्तपत्त्र, उत, ध्वर्, रत्नभूत, अमुया, आबद्ध, अभिगर्, समीहित, दंशच्छेद, स्वयंवरण, सुराप, निबद्ध, घोरता, दुरूह, बुभुक्षु, यायावर, प्रतिग्रामम्, प्रवा, देवयु, पायक, परिणायक, औदुम्बरी, पत्ति, परिमर्श, अपटुत्व, रातमनस्, तनया




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