हय्

हय्
हय् /hay/ (P. pr. /hayati/ — I; pf. /jahaya/; aor. /ahayīt/; pp. /hayita/)
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हेलावन्त्, पूग, नाकपति, विहरण, महिमन्, बालभाव, भावरूप, वृक्षौकस्, महाकपि, व्रज, भौरिक, व्रतचर्या, कङ्कत, विश्, दुर्विद्य, चिबुक, जपिन्, प्रतिक्षोणिभृत्, शीरि, प्रधर्षय्, संस्तव, उदकान्त, गृहमेधिनी, परिदेविन्, बृहद्गिरि, क्षण, अचिन्तनीय, प्रतिश्रु, सुकथा, मन्थ्, समधिक, प्रमृग्य, विप्रलम्भिन्, अभ्ये, भाषिक, आपू, शातन, आवद्, सलोकता, उपहारक, अभिज्ञान, उष्णीष, चिकीर्षित, अभिवल्ग्, यशोघ्न, पृथुश्रवस्, स्त्रीजन, दुश्चित्, जतू, धीवरक, सख, विनिमय, श्ववाल, छत्त्रधार, कात्यायन, जाहक, विरोह, °पर्, धर्मराज, स्तन्, सप्तवध्रि, रौमय, वसुमती, आचार्यता, कामशास्त्र, परिचर्या, नित्यता, डात्कृति, उपश्लिष्, अधमाङ्ग, निवत्, विकिरण, नृदेव, अम्भस्, स्वधर्म, अपरक्त, प्रीतिसंगति, वृषत्व, वीचि, शायक, शकुर, एकश्रुति, अक्षीण, आदिमूल, सूर, कील, सुस्थिति, प्रलम्ब्, हव्यप, अवध्यत्व, प्रातिवेश्मिक, निरिच्छ, सटा, अतिकोप, दब्ध्वा, बत, कूर्म, त्रयोदशन्, मदीय, अनुरूप, हय-मेध, विव्रश्च्, विशातन, रघुष्यद्, संमाननीय, वनोपेत, पौलोम, श्येताक्ष, मन्, वरप्रद, हस्तवन्त्, व्युत्था, राजर्षि, अनवाप्त, सुरी, राज्यस्थायिन्, सलक्षण, पुत्रकृथ, सहस्रकिरण, पराङ्मुख, मध्यमपदलोप, प्रवपण, दर्शन, शीर्णत्व, शकट, त्वाम्, अजितेन्द्रिय, तन्यता, कुसीद, स्नानोत्तीर्ण, लब्धि, वरत्रा, विघ्नजित्, नृत्, अष्टम, वरीमन्, करिणी, चाट, नयकोविद, समाराधन, शक्वन्, परिष्कृत, मषि, दुःखत, शुक्लदन्त्, त्रिवेदी, जीवदायक, भगवती, प्रेक्षणक, पल्ली, साम्य, परिवाह, प्रत्यक्ष, तावत्, क्रीडिन्, आहि, प्रत्यावर्त्, द्यावा-पृत्हिवी, उपहिंस्, अञ्जना, नरपाल, चोष, माषक, वृजनी, कतिपय, धायय, लाट, विव्यथित, अन्यतर, धीर, पूर्वकाय, तदा, मेद्य, स्तब्धी, मर्षण, अविश्वसनीय, मन्दिन्, अंस, अशीति, संमूढ, विजल्प, परिछिद्, दिदृक्षेण्य, सार्चिस्, समाहर, म्लानि, निवसथ, त्रुट्, जङ्गम, आपाटल, लावण्यमय, दैत्यारि, धान्यार्घ, अन्त, निष्ककण्ठ, मानवर्जित, पीडित, क्षय, हुत्°, तैल, रसिन्, अद्धाति, लपन, बाहुबन्ध, विंशतिक, वासतेय, परमाक्षर




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