जङ्घा

जङ्घा
जङ्घा /jan_ghā/ f. нога (до ступни)




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व्यावृत्, बहुरजस्, स्वयंभू, समर्य, क्लिद्, लोभ, दण्डका, काञ्चनप्रभ, , निवर्तक, उपभुज्, अविश्वसनीय, विचय, अनुहा, विश्रम्भ, न्यस्तदण्ड, सविस्मय, सपत्नक्षयण, जिघांस्, विपुल, द्रुतविलम्बित, विभूषित, प्रायण, जागरक, त्रिस्रोतस्, °संहर्षिन्, यत्न, असंशय, अनिच्छा, समुन्नतु, रोच, सैन्धव, पञ्चगव्य, जनिता, स्त्यै, पत्त्रिन्, शुश्रूषक, शीर्य, भञ्ज्, प्रतिप्रति, अभिहा, निर्यापण, संचिति, तङ्गण, कनीनक, मधुमय, निकर्ष, अक्षण्वन्त्, स्पर्श्, निःष्ठिव्, राजश्री, हर्ष, दन्तुर, उल्लसित, वेदव्यास, मितभुक्त, शरीरिन्, नित्यमय, शशलक्षण, स्नानिन्, क्षिति, क्षाम्, द्यूतदास, बिसवती, स्तनमध्य, मद, वेदान्त, किरीट, शष्पवन्त्, दल्, अधिवच्, निर्णेक, विशद, न्यर्ण, निषिध्, विस्तारित, नैकविध, नीलोत्पल, हस्त, स्रष्तर्, स्रष्तार, अपिगम्, निगडय, सुषिरता, गुणोत्कृष्ट, सार्प, लङ्घय्, पण्य, दीर्घश्रुत्, बालिशत्व, वस्तु, उद्वह, समनुमन्, परिरभ्, वेतण्ड, त्वादात, कुलतन्तु, यूथ, प्रमदा, प्रतिरव, उन्मथ्, भट्ट, सिंहल, पटान्त, नाष्ट्रा, अदन्त, आलि, दूढी, जघन्य, क्षि, क्षञ्ज्, शुभार्थिन्, अनुसच्, अभिहर्य्, गञ्ज, स्पष्टार्थ, रथवर्त्मन्, शङ्खध्म, अवमान, क्रव्य, शरव्या, दण्डिक, अदर्शन, सृत्वन्, सार्थिक, बह्वादिन्, याचिष्णुता, मण्डलिन्, प्रियंवदा, दर्शनपथ, अल्पता, पञ्चवर्षक, नराश, तीक्ष्णत्व, किल्बिष, धूर्वोठर्, सावर्ण, पांशन, किंमात्र, महनीय, मन्त्रिपति, दूरस्थित, लौल्य, तेन, निवाप, आह्वय, निवारक, पतिव्रत, वैरहत्य, चान्द्रमस, तर्कुक, नियान, तित्तिरि, प्रश्लेष, नक्षत्रिय, प्रगाढ, संभावनीय, रुशत्पशु, अधिजन्, उष्णालु, काव्यकर्तर्, स्था, उत्तान, सूत्रकार, मर्यादिन्, अनुताप, संयुध्, गोमय, वेदीयंस्, दस्मन्त्, जनाधिप, समान, एणीद्र्_श्, एकविध, भेषज्य, घृणिन्, प्रातरह्ण, वीज्, संजि, उदयगिरि, आवप्, मूलफल, लज्, प्रतिनी, सार्थक, चन्द्रक्षय, आसेवन, °दन्तक, वाण, बहुदान, गण्डलेखा, विधूम, साधुशब्द, मर्त्य, कान्ति, निर्गुणता, वस्तु, कालकुट, चामीकर, ग्रैवेयक, मल्लयुद्ध, चक्षुष्मन्त्, षष्ठी, विषु, चुलुक, शालापति, स्थूलान्त्र, सुकेशन्त




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