मृ

मृ
मृ I, II /mṛ/ см. मर् I, II




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भुज्, दुष्प्रकृति, संवत्सरीण, प्रागवस्या, निह्नव, हान, शुक, व्याप्त, परिकर्, शुभव्रत, धृतात्मन्, प्रियदर्श, निर्निद्रता, तीक्ष्णाग्र, संलिप्, उदीष्, उदीर्य, वराट, स्थाणुच्छेद, न्यास, दर्शपूर्ण-मास, पुङ्ख, परुत्क, शरस्, उदुम्बर, प्रत्ययित, सप्रणामम्, श्रोणि, परिक्लिन्न, यमराज्य, धृतद्वैधीभाव, मथिन्, दुर्भिद, बालचरित, तुवि°, अशुद्धि, मन्दबुद्धि, प्राहुण, सौरभ्य, श्येनजूत, विद्युन्मन्त्, मृध्, वाम्य, विपद्, परे, भट्टारक, मेह, भावकर्तृक, संचित, निषक्त, त्रिदशायुध, सार्प, ब्रह्मस्व, श्रुतसेन, परिग्लान, वाश, निर्धन्त्व, परिमर्द्, नम्रत्व, शाक्वर, प्रातर्यज्ञ, साविनी, निपाठ, रणमूर्धन्, संवच्, जिजीषु, वार्त्तिक, बहिर्धा, उदुम्बल, ऋत, विकर्मिन्, अवरज, लिखित, हनन, प्रत्युक्ति, नालिकेल, प्रत्यृचम्, प्रत्यानयन, नीचक, युष्मभ्यम्, हस्तग्रभ, शस्त्रिन्, अशनायवन्त्, श्रावितर्, स्नानीय, तनीयंस्, अवसेक, कुक्षि, हिताहित, वयस्, प्रच्यु, नैकटिक, कुसुम्भ, पूर्वकालता, आश्वास, पार्थ, अप्रतिमान, अबद्ध, संतनि, त्वादृश्, व्यतिरिक्त, चिन्तामणि, परिणाह, सुशील, अक्तु, मिथ्यावचन, अल्पभाग्यत्व, अविरुद्ध, दक्ष, स्थूलान्त्र, वाग्देवता, दब्ध, द्युपथ, कवच, विमत्सर, शालातुरीय, कार्पासिका, अलोभ, शशभृत्, देवजन, भन्द्, चारुनेत्र, अभिवल्ग्, खै, दिङ्नाग, सुबाल, पुरुषमानिन्, परिस्तोम, सरश्मि, संहु, संतापन, हार, भुरण, यज्ञकाम, अश्वघोष, लघिमन्, हरिणी, चक्रि, दिवास्वप्न, एकरूपता, अवक्षिप्, सगन्ध, सुरासुर, एनास्, रम्भ, विष्टम्भन, प्रकृति, कुचेल, सङ्का, श्वित्न्य, समाश्रय, गोपथ, विवर्ण, बिम्ब, गेह्य, अधिवास, मंहना, विचि, मनुष्वत्, रक्षस्त्व, हंसाभिख्य, संधान, संयतेन्द्रिय, विपणिगत, संध्यासमय, धृषद्विन्, अतिवद्, अभिसिच्, उन्मुख, प्लवित, अस्माकम्, रूप्यमय, वसुधेय, शतकृत्वस्, महेश, देदिह्, पृथुता, शतसाहस्र, दुर्भेद, प्रयाण, ढक्क, विमुग्धता, सर्वभूत, स्वर्गकाम, ब्रह्मचर्याश्रम, प्रज्ञा, वार्षिक, शुद्धवंश्य, विज्ञाति, प्रथीयंस्, व्रतति, द्रधस्, वर्ष्य, मच्, कार्ष्णायस, द्वंद्वशस्, ललाम, गूर्द, मौन, दृष्टिगोचर, सानु, प्रश्नकथा, हृदयेश्वर, सहन, प्रवृद्धि, वेदितर्, अच्छिन्न




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